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Hal-E-Dil | हाल-ए-दिल,कविता शायरी हिन्दी में
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Sunday, December 27, 2015
चलने से कुछ नहीं होता !
लोग कहते हैं चलने से कुछ नहीं होता...!!
रास्तों पर चलते चलते, "जिले और शहर" बदल जाते हैं...
शरीर से "जीवन" चला जाये....
...तो इंसान "जिन्दा" से "मुर्दा" हो जाता है !
Monday, November 2, 2015
शहर की जिंदगी एक लाश बन गई है !
शहर की जिंदगी एक लाश बन गई है,
न होश है, न ठिकाना, न मतलब है,
न परवाह, न खबर है, न इत्मेनान
है
दौड़ती ये जिंदगी की रफ़्तार कैसी ??
गिरते हैं कहर, फुर्सत नहीं मिलती मिलने की,
पता भी नहीं होता,ये आखरी दौड़ है
जिंदगी
की,
शमशान तक !!
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